Mar 12, 2026

चार दिन में 50 हजार की बिक्री: विधानसभा सत्र ने पहाड़ी महिलाओं के लिए खोले आर्थिक समृद्धि के नए द्वार

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उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में चल रहे विधानसभा बजट सत्र ने जहां राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है, वहीं आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी नई रौनक लौट आई है। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और अधिकारियों की आवाजाही के बीच यहां स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को भी अपनी आजीविका बढ़ाने का बड़ा अवसर मिला है। पहाड़ी भोजन और स्थानीय उत्पादों के जरिए महिलाएं अच्छी कमाई कर रही हैं और साथ ही पहाड़ के पारंपरिक स्वाद को भी नई पहचान मिल रही है।

दरअसल, विधानसभा परिसर और उसके आसपास इन दिनों स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक पहाड़ी भोजन की खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। ग्राम्य विकास विभाग के अंतर्गत संचालित उत्तराखंड राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से यहां पहाड़ी भोजन की एक विशेष कैंटीन संचालित की जा रही है। इस कैंटीन में मिलने वाली पारंपरिक पहाड़ी थाली विधानसभा सत्र के दौरान खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस कैंटीन को ‘मां भराड़ी देवी स्वयं सहायता समूह’ की महिलाएं संचालित कर रही हैं। समूह की सदस्य यशोदा बताती हैं कि वे पिछले तीन वर्षों से बजट सत्र के दौरान यहां कैंटीन लगा रही हैं। जैसे ही सत्र शुरू होता है, उनकी व्यस्तता भी कई गुना बढ़ जाती है। सुबह से शाम तक ग्राहकों की इतनी भीड़ रहती है कि कई बार संभालना मुश्किल हो जाता है। यशोदा के अनुसार उनकी पहाड़ी थाली में झंगोरा, लाल चावल, चौंसा, भट्ट की चुड़काणी, भंगजीर और भांग की चटनी के साथ पहाड़ी रायता और कोदे की रोटी परोसी जाती है। पौष्टिक और पारंपरिक स्वाद से भरपूर इस थाली को चखने के लिए विधायक, अधिकारी, कर्मचारी और पत्रकारों तक की लंबी कतार लग जाती है। सरकारी भोजन व्यवस्था होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग इस छोटी सी कैंटीन तक पहुंचते हैं।

यशोदा बताती हैं कि विधानसभा सत्र के दौरान बिक्री काफी अच्छी रहती है। कई बार दो से चार दिनों में ही करीब 50 हजार रुपये तक की बिक्री हो जाती है, जो आम दिनों की तुलना में काफी ज्यादा है। हालांकि, सत्र खत्म होते ही यहां की चहल-पहल भी अचानक समाप्त हो जाती है और बिक्री लगभग शून्य हो जाती है। विधानसभा परिसर में स्थानीय उत्पादों के स्टॉल भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। यहां विभिन्न स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार किए गए कई पहाड़ी उत्पाद उपलब्ध हैं। इन स्टॉलों पर अलग-अलग फ्लेवर के अचार, मंडुवे के बिस्कुट और नमकीन, पहाड़ी दालें, पारंपरिक मसाले तथा पहाड़ी गाय का शुद्ध घी जैसे उत्पाद बिक रहे हैं। ये सभी उत्पाद स्थानीय महिलाओं द्वारा तैयार किए जाते हैं और इन्हें सरकार के हाउस ऑफ हिमालयाज ब्रांड के तहत बाजार में उतारा जा रहा है। स्वयं सहायता समूह की सदस्य उर्मिला देवी बताती हैं कि उनके समूह से कई महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो अपने गांवों में पिस्युं लून (पीसा नमक), विभिन्न प्रकार के अचार और दालें जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार करती हैं। सरकार की योजनाओं से उन्हें काफी मदद मिल रही है और ऐसे आयोजनों में उन्हें अपने उत्पाद सीधे लोगों तक पहुंचाने का मौका मिलता है। इस दौरान कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी भी पहाड़ी भोजन की कैंटीन पहुंचे और उन्होंने पहाड़ी थाली का स्वाद लिया। उन्होंने महिलाओं के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि “लखपति दीदी” जैसी योजनाएं महिलाओं के सशक्तिकरण का सफल मॉडल बन रही हैं और इसके सकारात्मक परिणाम अब जमीन पर दिखाई दे रहे हैं। भराड़ीसैंण में बजट सत्र के दौरान दिखाई देने वाली यह तस्वीर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलाव की भी झलक देती है। यह साबित करती है कि यदि स्थानीय उत्पादों और महिलाओं को सही मंच और अवसर मिले तो वे न केवल अपनी आजीविका मजबूत कर सकती हैं बल्कि पहाड़ की संस्कृति और पारंपरिक खानपान को भी नई पहचान दिला सकती हैं। हालांकि, सवाल यह भी है कि क्या यह रौनक केवल विधानसभा सत्र तक ही सीमित रहेगी या भविष्य में इन महिलाओं को पूरे साल अपने उत्पाद बेचने का स्थायी मंच भी मिल सकेगा।