अस्पताल नहीं कर सकेंगे पहचान पत्र या अग्रिम भुगतान का बहाना, सिविल सर्जन ने निजी प्रबंधकों को दी कड़ी चेतावनी

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रांची। सड़क दुर्घटनाओं में समय पर इलाज न मिलने के कारण टूटने वाली सांसों को बचाने के लिए रांची जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील पहल की शुरुआत की है। अब रांची जिले के भीतर सड़क हादसे में घायल किसी भी मरीज का निजी (प्राइवेट) अस्पतालों में 1.50 लाख रुपये तक का आपातकालीन इलाज पूरी तरह से मुफ्त होगा। इस जीवन रक्षक योजना की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि इसका लाभ उठाने के लिए मरीज या उसके परिजनों को किसी भी प्रकार के आयुष्मान भारत कार्ड, मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना या किसी निजी हेल्थ इंश्योरेंस (स्वास्थ्य बीमा) के दस्तावेज दिखाने की कोई जरूरत नहीं होगी।

इस नई व्यवस्था को धरातल पर उतारने के लिए रांची के सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने जिले के सभी प्रमुख निजी अस्पतालों के प्रबंधकों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। सोमवार को हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में स्पष्ट किया गया कि जैसे ही कोई सड़क दुर्घटना का घायल मरीज अस्पताल पहुंचता है, प्रबंधन को बिना किसी देरी या औपचारिकता के तुरंत उसका प्राथमिक और जरूरी उपचार शुरू करना होगा। अस्पताल प्रबंधन मरीज की आर्थिक स्थिति, भुगतान करने की क्षमता या किसी पहचान पत्र की कमी का बहाना बनाकर इलाज में देरी या आनाकानी कतई नहीं कर सकता। प्रशासन ने प्राइवेट अस्पतालों द्वारा मरीजों को तुरंत दूसरे अस्पतालों में 'रेफर' करने की आदत पर भी पूरी तरह से रोक लगा दी है। यदि मरीज की स्थिति अत्यंत गंभीर है और उसे किसी उच्च चिकित्सा संस्थान (जैसे रिम्स) भेजने की जरूरत है, तो भी पहले अस्पताल को उसे प्राथमिक उपचार देकर स्थिर (स्टेबलाइज) करना होगा, उसके बाद ही रेफर करने की अनुमति मिलेगी। निजी अस्पतालों को इलाज के बदले होने वाले खर्च के भुगतान के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। स्वास्थ्य विभाग ने साफ किया है कि इस मुफ्त इलाज पर होने वाले 1.50 लाख रुपये तक के खर्च का क्लेम अस्पताल सीधे 'मुख्यमंत्री राहत कोष'  के माध्यम से कर सकेंगे। पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अस्पतालों को दुर्घटना से जुड़े हर मरीज का पूरा विवरण, उसकी स्थिति, किए गए इलाज और खर्च का ब्योरा रोजाना स्वास्थ्य विभाग के विशेष पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा। इस पोर्टल पर इलाज करा रहे घायलों के साथ-साथ दुर्भाग्यवश दम तोड़ने वाले मृत व्यक्तियों के रिकॉर्ड भी दर्ज करने होंगे ताकि जिला प्रशासन इस पूरी मुहिम की बारीकी से निगरानी कर सके। चिकित्सा विज्ञान में दुर्घटना के बाद के पहले घंटे को 'गोल्डन आवर' कहा जाता है, जिसमें अगर इलाज मिल जाए तो 80 फीसदी तक जान बचाई जा सकती है। सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि प्राइवेट अस्पताल पैसों के अग्रिम भुगतान या कागजी झंझटों के कारण इलाज शुरू नहीं करते या मरीजों को रेफर कर देते हैं, जिससे रास्ते में ही मौत हो जाती है। सरकार का यह कदम निजी अस्पतालों की इस मनमानी को खत्म कर 'नो टाइम पास, फौरन इलाज' की संस्कृति को स्थापित करेगा।