सरहद पर सजे सुरम्य आशियाने: 'वाइब्रेंट विलेज' से उत्तराखंड के सीमांत गांवों में पर्यटन व एडवेंचर को लगेंगे पंख

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देहरादून। भारत-चीन सीमा पर स्थित उत्तराखंड के सीमांत गांव अब केवल सामरिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं रहे, बल्कि वे पर्यटन, एडवेंचर और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के नए वैश्विक केंद्र बनकर उभर रहे हैं। केंद्र सरकार की अति-महत्वाकांक्षी 'वाइब्रेंट विलेज योजना' के तहत देवभूमि के सीमावर्ती इलाकों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। पलायन को रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए पारंपरिक काष्ठकला और पहाड़ी स्लेट-पत्थरों से तैयार किए जा रहे खूबसूरत घर अब पूरी तरह आकार ले चुके हैं, जो पहली ही नजर में हर किसी का मन मोह रहे हैं।

कभी भारत-चीन युद्ध की यादों और पलायन के दर्द से वीरान हुए उत्तराखंड के सीमांत गांव अब नई उम्मीद के साथ फिर आबाद होने की राह पर हैं। चीन सीमा से सटे गांवों में जहां कभी सन्नाटा पसरा रहता था, वहां अब पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला, लकड़ी की नक्काशी और स्थानीय पत्थरों से तैयार खूबसूरत घर नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। केंद्र सरकार की वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत सीमांत क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के साथ पर्यटन, साहसिक गतिविधियों और स्थानीय संस्कृति को जोड़ने की कोशिश अब जमीन पर आकार लेती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिले के सीमांत क्षेत्रों में पहले चरण में 51 गांवों का चयन किया गया है। पर्यटन सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल के अनुसार इन क्षेत्रों में सड़क संपर्क, दूरसंचार, बिजली और आजीविका से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत किया जा रहा है। पर्यटन विभाग की ओर से वाइब्रेंट विलेज क्षेत्रों में करीब 171 करोड़ रुपये की विकास योजनाएं संचालित की जा रही हैं। उद्देश्य सिर्फ सीमांत क्षेत्रों में सुविधाएं पहुंचाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और पर्यटन से जोड़कर पलायन की चुनौती से निपटना भी है। इस बदलाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर उत्तरकाशी के जादूंग गांव में दिखाई दे रही है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान खाली कराए गए इस गांव को दोबारा जीवंत करने की कोशिश की जा रही है। यहां पुराने और क्षतिग्रस्त 23 घरों को उनके मूल प्लिंथ पर पारंपरिक पहाड़ी शैली में पुनर्निर्मित किया जा रहा है। इन भवनों में देवदार की लकड़ी पर बारीक नक्काशी और स्थानीय पत्थरों की पारंपरिक चिनाई का इस्तेमाल किया जा रहा है। पत्थर और स्लेट की ढलानदार छतें, लकड़ी के नक्काशीदार खंभे और पहाड़ी वास्तुकला के पारंपरिक तत्व इन घरों को अलग पहचान दे रहे हैं। इनमें से छह घरों का निर्माण 90 प्रतिशत से अधिक पूरा बताया गया है। योजना है कि इन्हें आगामी शीतकाल में ग्रामीणों और पर्यटकों के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाए। इन घरों को केवल रहने की सुविधा के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि होमस्टे, डॉरमेट्री और साहसिक गतिविधियों के बेस कैंप के रूप में विकसित करने की योजना है। विशाल चट्टानों और बर्फीली चोटियों के बीच पारंपरिक शैली में खड़े ये भवन सीमांत पर्यटन को एक नया अनुभव दे सकते हैं। नेलांग और जादूंग सिर्फ खूबसूरत पहाड़ी गांव नहीं हैं, बल्कि वर्ष 1962 के युद्ध की ऐतिहासिक स्मृतियों से भी जुड़े हैं। युद्ध के बाद ग्रामीणों को अपने घर छोड़ने पड़े और धीरे-धीरे ये इलाके वीरान हो गए। हालांकि स्थानीय लोग आज भी अपने देवस्थानों की पूजा-अर्चना के लिए इन क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं। अब इन गांवों को दोबारा जीवंत करने की कोशिश में इतिहास, संस्कृति और पर्यटन को एक साथ जोड़ा जा रहा है। यह बदलाव सीमांत क्षेत्रों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्यटन के जरिए स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में आय के साधन उपलब्ध हो सकते हैं। चमोली का माणा भी इस बदलाव की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। यहां करीब 70 से 80 करोड़ रुपये की लागत से पार्किंग, टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर और अन्य बुनियादी सुविधाओं का ढांचा तैयार किया गया है। माणा से आगे गस्तोली क्षेत्र में आईटीबीपी के सहयोग से ‘सीमा दर्शन’ कार्यक्रम भी संचालित हो रहा है। नीती घाटी के टिम्मरसैंण को प्राकृतिक बर्फ के शिवलिंग के दर्शन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां करीब 25 करोड़ रुपये के कार्य संचालित बताए गए हैं। धार्मिक पर्यटन के साथ ट्रेकिंग और साहसिक पर्यटन को जोड़ने से इस क्षेत्र में पर्यटकों और स्थानीय युवाओं के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। इसी तरह व्यास और दारमा घाटियों में कम्युनिटी बेस्ड टूरिज्म तथा होमस्टे को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका सीधा लाभ स्थानीय निवासियों को रोजगार और आय के अवसरों के रूप में मिल सकता है। सीमांत गांवों में बन रहे ये पारंपरिक घर इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें विकास और विरासत का मेल दिखाई देता है। यदि सड़क, संचार, बिजली, पर्यटन सुविधाओं और स्थानीय रोजगार का ढांचा लगातार मजबूत होता है तो ये गांव केवल पर्यटकों के नक्शे पर नए गंतव्य नहीं बनेंगे, बल्कि पलायन के बजाय वापसी और रोजगार की नई कहानी भी लिख सकते हैं। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि पर्यटन विकास का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे, पारंपरिक वास्तुकला और पर्यावरण की पहचान सुरक्षित रहे और सीमांत क्षेत्रों में बढ़ता पर्यटन स्थानीय संस्कृति पर दबाव बनने के बजाय उसकी ताकत बने। तभी वीरान सीमांत गांवों में लौटती यह रौनक स्थायी बदलाव का रूप ले सकेगी।